हमारा परिचय

प्राच्य अथार्त पहले का प्रथम I किसी भी देश की अपनी एक संस्कृति होती हैं जो उस देश का हृदय या प्राण होती हैं , जैसे प्राण प्रतिष्ठा से ही हमारा शरीर स्थित हैं उसी तरह हमारे भारत देश का प्राण भी हमारी अनोखी वैविध्यसभर संस्कृति एवं सभ्यता से ही सिद्ध है मानव जीवन का सर्वश्रेस्ठ संशोधन उसकी सस्कृति होती हैं I इसी संस्कृति को बाहय रूप में उसकी जीवन शैली में परिष्कृत और उन्मुख करने वाली वस्तु को उसकी सभ्यता कहते हैं Iभारतीय संस्कृति एवम सभ्यता का मूल हमारा प्राचीन सनातन हिन्दू धर्म ही हैं इसी प्राचीन सनातन धर्मं में अपौरुषेय वेदों का प्रदुभार्व हुआ विश्व की सबसे विलक्षण और प्राचीन इस वैदिक संस्कृति में आत्मा और इश्वर की सत्ता को स्वीकार किया गया. आत्मा और परमात्मा के प्रति किये हुए कर्म जिनके द्वारा आत्मा उन्नत और पुष्ट उत्क्रष्ट हो उसे ही प्राच्य कर्म कहा गया हैं हमारे प्राचीन वेदकालीन ऋषि महर्षियों ने प्राक्रतिक नियमो के आधार पर मानव समुदाय और हिंदु धर्म में सामंजस्य स्थापित कर विश्व में अद्रितीय प्राचीन हिंदू संस्कृति और सभ्यता को स्थापित किया.

ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हिन्दुओ का जन्म इस पृथ्वी के भरतखंड पर सिधु घाटी सभ्यता के भी बहुत पहले हुआ था, यह वो समय था जब विश्व की मानव सभ्यता ने विकास और उपलब्धियों की बुलंदी को छुआ था, वर्तमान भारत देश की इसी भूमि पर अत्यंत विलक्षण ऋषिमुनि उग्र तपस्या करते थे और अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर प्रकृति एवं पुरुष(मानव) के अनेकानेक रहेस्यो एवं सुक्ष्म तत्वों को जैसा सत्य में प्रत्यक्ष अनुभव करते थे उसे वैसे ही लिखकर ग्रन्थबध कर देते थे जिन्हें हम आज वेद,पुराण,शास्त्र आदि नामो से जानते हैं उनके द्वारा स्थापित प्रच्याकर्म सिद्धान्त पूर्णत: वैज्ञानिक एवं मानव मात्र के कल्याण के ही सूत्र थे मानव एवं प्रकृति दोनों का सुयोग समन्वय स्थापित कर शीघ्रता एवं सुगमता से विकास कैसे हो इसका गंभीर चिंतन प्राचीन ऋषियों ने किया था I

जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जिन प्रकृतिजन्य पदार्थो के संपर्क में आता हैं और वह जो जो क्रियाएँ करता है उन सबको प्राचीन ऋषि मुनियों ने सुनियोजित एवं मर्यादित तरीके से लिपिबद्ध किया I इन ग्रंथो मे वणिेत परमाणु बम, विमान , गुरुत्वाकर्षण एवं भौतिकविज्ञान भ्रून्स्थानांतरण एवं जीवविज्ञान में ऑर्गन ट्रांसप्लांट चन्द्र,मंगल एवं अन्य ग्रह गमन आदि अनेक वैज्ञानिक उन्नतियो का उपयोग कर हमारे पूर्वज सुखी सम्पन होकर रहते थे और प्रकृति माता की गोद में शान्तिपूर्ण रूप से विकसित एवं पुष्पित पल्लवित होते थे वर्तमान समय में पाश्चात्य मानव प्रगति और विकास के नाम पर मनुष्य को अल्पकालीन सुखी बनाने के लिए तरह तरह के नए नए खोज एवं आविष्कार करता जा रहा हैं और सम्पूर्ण प्रकृति एवं मानवता को विनाश के मार्ग पर अग्रसर कर दिया हैं I पश्चिमी विश्व का विकास भारत के प्राचीन ऋषियों के विकास के मानदंड से बिलकुल भिन्न हैं I उनका विकास प्रकृति और मानव का सुयोग साधकर एक दोष रहित जीवन शैली को स्थापित करना तो कदापी नहीं रहा अपितु उनका विकास प्रकृति का दोहन कर अप्राकृतिक व्यवस्थाओ का निर्माण कर मानव सभ्यता के विनाश का मार्ग स्वयं से प्रशस्त करना ही रहा हैं फलस्वरूप आज का आधुनिक मनुष्य सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं से सम्पन्न होने के बावजूद हॅंमेशा अशांत, तनावयुक्त शारीरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रसित तथा दुखी और परेशान दिखाई देता है हमे भी अपने गौरवपूर्ण प्राचीन कर्म सिद्धान्तों और जीवन मूल्यों को भूलकर पशिचिमी सभ्यता की अंधी नक़ल करने लगे हैं किसी समय काल में संपूर्ण विश्व को राह दिखाने वालो के वंशज आज स्वयं भ्रमित नजर आते हैं योग,आयुर्विज्ञान,वेद,पुराण को भूल गए है I

शास्त्रों मे वर्णित उच्च एवं आदर्श पारिवारिक मूल्यों को दरकिनार कर पाश्चत्य आविष्कारो एवं तौर-तरीकों के मकड़ जाल में फॅंसते चले जा रहे हैं आज हमारी वर्तमान पीढ़ी भारतीय सभ्यता और प्राचीन धर्म-कर्म से बिलकुल अन्भिग्य होती जा रही हैं इसलिए आईये सत्य सनातन हिंदू धर्मं को शुद्ध मौलिक स्वरुप में पहचानें और हमारे वेद शास्त्र एवं महापुरुषों द्वारा प्रमाणित प्रच्य कर्म जैसे- ज्योतिष,कर्मकांड,सोडश-संस्कार,वास्तु,व्रत त्यौहार एवं तीर्थ आदि का संपूर्ण मार्गदर्शन तथा ज्ञान भारत के उत्कृष्ट एवं विशेषज्ञ ब्राह्मणों तथा विद्वानों द्वारा प्राप्त करें और प्राचीन काल के स्थापित नियमों और कर्मो का पालन कर जीवन को सुखमय बनाये. इसी में विश्व का कल्याण है और मनव सभ्यता का विकास भी.


I सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः I

II सर्वे भद्राणि पश्यन्तु : मा कश्चिद् दुःख भाग भवेद् II