दुनिया में सैकड़ों धर्म हैं..हर इंसान अपने धर्म के मुताबिक अफनी दिनचर्या का पालन करता है। धर्म किसी एक या अधिक परलौकिक शक्ति में विश्वास और उसके साथ जुड़ी रिति, रिवाज़, परम्परा, पूजा-पद्धति और दर्शन का समूह है। सरल शब्दों में कहा जाए तो जिंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है।

शास्त्रों के मुताबिक धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यानि धर्म में बताए रीति रिवाजों पूजा पद्धतियों और परंपराओं का पालन करके अपनी जीवन यात्रा पूरी करता है।

प्राचीन धर्मशास्त्रों या कहे कि मध्यकाल तक धर्म एवं दर्शन के प्रमुख प्रतिमान बनाए गए थे..ये थे- स्वर्ग की कल्पना, सृष्टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्वर की कल्पना, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, अपने देश एवं काल की माया एवं प्रपंचों से परिपूर्ण अवधारणा।उस युग में व्यक्ति का ध्यान अपने श्रेष्ठ आचरण, श्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान जीवन की समस्याओं का समाधान करने की ओर कम था, अपने आराध्य की स्तुति एवं जय गान करने में अधिक था

धर्म के व्याख्याताओं ने संसार के प्रत्येक क्रियाकलाप को ईश्वर की इच्छा माना तथा मनुष्य को ईश्वर के हाथों की कठपुतली के रूप में स्वीकार किया..यानि ईश्वर की इच्छा से जो कुछ भी दुनिया में घटित होगा उसके अच्छे बुरे पक्षों को क्रियान्वित करने वाला और भोगने वाला भी मनुष्य होगा.। ईश्वर ने सृष्टि चलाने के लिए कुछ नियम बनाए जिनका पालन करके इंसान आगे बढ़ता गया…इन्हें ही धर्म माना गया।

धर्म में ऊंच-नीच, रंग-भेद, नस्ल या लिंग-भेद के लिए कोई स्थान नहीं है । अलग अळग भौगोलिक परिवेश में रहने के कारण किसी का रंग सांवला या श्वेत हो सकता है।इसी तरह धर्मशास्त्रों में सभी को एक ही ईश्वर की संतान माना गया है।

आज के युग ने यह चेतना प्रदान की है कि विकास का रास्ता हमें स्वयं बनाना है। किसी समाज या देश की समस्याओं का समाधान कर्म-कौशल, व्यवस्था-परिवर्तन, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्ठा से सम्भव है।

आज के मनुष्य की रुचि अपने वर्तमान जीवन को सँवारने में अधिक है। उसका ध्यान भविष्योन्मुखी न होकर वर्तमान में है। वह दिव्यताओं को अपनी ही धरती पर उतार लाने के प्रयास में लगा हुआ है